वास्तव में प्रेतयोनि अत्यंत निकृष्ट और अधमयोनि हैं। वासनाओं की प्रबलता और उन वासनाओं का इन्द्रियों के अभाव में पूरा न होना ही प्रेतयोनि का सबसे बड़ा कष्ट है। जिस कारण प्रेत आत्मा (pret aatma) को प्रेतयोनि उपलब्ध होती है उसी की यातना उनका भोग होता है। जबतक वह भोग है तबतक प्रेतयोनि से मुक्ति संभव नहीं।
देवयोनि सर्वोच्च योनि है। उसके नीचे मनुष्ययोनि है और उसके नीचे पितृयोनि है। इन तीनों योनियों में आत्मा प्रकृति का अद्भुत आनंद लेती है। प्रकृति के रहस्यों से परिचित होकर उल्लासित होती है। अपनी मानसिक तृप्ति भी कर सकती है। अपनी इच्छानुसार कार्य भी एक सीमा तक कर सकती है।

लेकिन प्रेतयोनि में यह सब कुछ संभव नहीं। ये उपलब्धियों और ये तमाम सुविधाएं प्रेतयोनि में आत्मा को प्राप्त नहीं होती। वासनाओं के वेग को सहन न कर सकने, उसकी पूर्ति न हो सकने और उपर्युक्त उपलब्धियों व सुविधाओं के न हो सकने के कारण घबरा कर प्रेत आत्महत्या कर लेते हैं। लेकिन वे ही प्रेत (pret aatma) आत्महत्या करते है जो मूढ़ किंकर्तव्यविमूढ़ और निम्नकोटि के होते हैं।
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आत्महत्या करने वाले प्रेत समझते हैं कि उन्हें मनुष्ययोनि मिल जाएगी, लेकिन ऐसा होता नहीं। वे कुत्ता, बिल्ली, नेवला, सांप जैसे निकृष्टयोनि में जन्म लेते हैं।
वास्तव में पूर्वकृत कर्मों के अनुसार उनके मन में स्वयं इस प्रकार के निकृष्ट योनियों में जन्म लेने की इच्छा उठ खड़ी होती है। वास्तव में ऐसे प्रेतात्माएँ (pret aatma) अत्यंत पापी, निकृष्ट होती है। वे काफी समय तक विभिन्न निकृष्ट योनियों में भटकने के बाद मनुष्ययोनि को उपलब्ध होते हैं। लेकिन उनका जन्म होता है निम्न स्तर की जाति में दरिद्र परिवार में। उनकी सहायता का अर्थ है उनके पापांश को लेकर उसे अपने जीवन में भोगना।
परमात्मा संसार में दंड देने के लिए किसी भी मनुष्य का नहीं पकड़ता बल्कि दंड की स्थिति से गुजरने की बुद्धि उत्पन्न कर देता है।
मनुष्य अपने पाप-पुण्य और अच्छे-बुरे कार्य का स्वयंभागी है। दुख-सुख का वह स्वयं निर्माण करता है। स्वयं अनुकूल व प्रतिकूल वातावरण अथवा परिस्थिति का निर्माण करता है, इनमें परमात्मा अथवा किसी भी दैवीशक्ति का हाथ नहीं होता।
परमात्मा कोई व्यक्तिगत संज्ञा नहीं है। वह सर्वव्यापक परमतत्व है। वह सर्वत्र प्रकाशित है। उसकी प्रकाश में मनुष्य पाप करे या पुण्य अच्छा करे या बुरा उससे परमात्मा का कोई लेना देना नहीं।
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