क्या पुनर्जन्म इसी शरीर का संभव है या नहीं ? इस बारे में आगे जानते है।
शरीर से अमर होने की आकांशा भले ही पूरी न हो सके पर निस्संदेह मानवी प्रयास निकट भविष्य में लंबा दीर्घ जीवन प्राप्त करने की समस्या हल कर लेंगे।
मनुष्य क्यों बूढा होता है उर क्यों मरता है इस प्रश्न के उत्तर में पिछले दिनों यह कहा जाता रहा है कि इसका कारण नाड़ियों का कड़ा हो जाना है, कोशिकाओं की कोमलता घट जाना और विभिन्न अंगों में कई तरह के अवांछनीय पदार्थों का जम जाना ही बुढ़ापे का करना है।

शोध प्रयासों ने इस दिशा में नए कदम बढ़ाये है और यह पाया है कि स्नायु समूह, कोशिका-संस्थान रक्तभिषरण आदि की दुर्बलताएं वस्तुतः मानसिक थकान के कारण उत्पन्न होती है। मस्तिष्क को श्रम तो बहुत करना पड़ता है पर उसे आवश्यक मात्रा में विश्राम नहीं मिलता।
मनः संस्थान असंतुलित रहने से समस्त शरीर प्रभावित होता है और बुढापा तथा बीमारी का सहारा लेकर मौत आधमकती है। यदि मस्तिष्क संतुलित रहे — आवेश जन्य तनाव उत्पन्न नहीं हो तो दीर्घ जीवन बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सरल हो सकता है।
- अकाल मृत्यु और बीमारी का कारण भ्रष्ट चिंतन
- आत्मा का अस्तित्व इंकारा नहीं जा सकता – existence of soul
सोवियत रूस के सर्वाधिक आयु वाले व्यक्ति का नाम है — शेराली। उनकी उम्र 1993 में 162 वर्ष थी। सीधी कमर, आंख कानों की सक्रियता यथावत चलने फिरने में उत्साह और कभी-कभी घुड़सवारों का प्रयोग देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि उनकी इतनी अधिक आयु हो सकती है उनकी पत्नी उस समय 94 वर्ष की थी और वह भी बिना किसी शारीरिक असमर्थता अथवा व्याधि व्यथा का अनुभव किये अपने बेटे पोतों, परपोतों से भरे पूरे कुटुम्ब में कुछ न कुछ करती ही रहती है।
अल्पायु में मरने के निम्न कारण है :
- आहार संबंधी मर्यादाओं का उल्लंघन
- अधिक या कम परिश्रम
- अस्तव्यस्त दिन चर्या
- नशे बाजी
- काम वासना संबंधी असंयम
- मानसिक तनाव
- स्वच्छता की उपेक्षा।
जो वस्तु जन्मी है उसका नाश होना ही है। नाश के बाद विकास और विकास के बाद नाश का कर्म चक्र अविच्छिन्न रूप से चलता है। यह चक्र भी चलता रहे और मनुष्य इसी शरीर से पुनर्जन्म प्राप्त कर सके इस संभावना पर वैज्ञानिक क्षेत्र में बड़ी रुचि पूर्वक खोज की जा रही है।
प्राचीन काल में मृत शरीर को देर तक सुरक्षित रखने की दृष्टि से अनेक प्रकार के सफल प्रयोग होते रहे है। राजा दशरथ का शव, भरत शत्रुघ्न के घर आने तक कुछ समय के लिए तेल से भरे पात्र में डुबो कर सुरक्षित रखा गया था।
मिश्र के बादशाही के शव विशेष प्रकार के मसालों में लपेट कर ताबूतों में बंद किये जाते थे ताकि वे चिर काल तक सुरक्षित रह सकें। वे मृत शरीर ‘ममी’ के नाम से अब भी मिश्र के पिरामिडों में सुरक्षित है। रूसो क्रांति के सफल पुरोहित लेलिन का शव अभी भी क्रेमलिन में सुरक्षित है। यह सब इसलिए होता रहा है कि उन शरीरों का कलेवर नष्ट न होने पाए और चिरकाल तक धरती पर अपना अस्तित्व बनाये रहे।
अमरता की इस आकांक्षा ने अब एक नई मोड़ ली है। प्रयत्न यह किया जा रहा है कि मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित करने के लिए उसे एक अवधि तक विश्राम करने दिया जाय और तदुपरांत मृतक को जीवित बनाने का प्रयोग आरम्भ कर दिया जाय। इस प्रयोजन के लिए अमेरिका के विभिन्न नगरों में 12 शव प्रशीतित ताबूतों में बन्द करके रखे गए हैं। विश्राम की अवधि 25 वर्ष पूरे हो जाने के उपरांत यह प्रयोग आरम्भ किया जाएगा कि उन शरीरों में जीवन का पुनः संचार हो सके।
इस प्रयास के मूल में यह मान्यताएं काम कर रही है कि श्रम की अधिकता और क्षरण की पूर्ति के लिए आवश्यक उत्पादन में कमी ही मृत्यु का कारण होता है। हर दिन नींद लेते रहने से जिस प्रकार थकान मिटा कर नई स्फूर्ति प्राप्त करने के आवश्यकता पूरी होती है इसी प्रकार मरण के उपरांत भी यदि शरीरगत कोशिकाओं को विश्राम मिल जाय तो उनमें न व जीवन लौट सकने की आशा की जा सकती। वे नवीन जन्म ग्रहण करने वाले बालक की तरह फिर कार्य रत हो सकती है।
चूंकि मरण के उपरांत गर्मी और हवा के प्रभाव से तेजी के साथ सड़न आरंभ हो जाती है और काया को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता इसलिए मुर्दे को गाढ़ने, बहाने या जलाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बनता और आमतौर से हर मरने वालों की अंत्येष्ठि करके उसका काय अस्तित्व समाप्त करना पड़ता है।
मूल शरीर को सड़न से बचाने का एक उपाय यह है कि उसे शून्य से नीचे के तापमान की शीतल स्थिति में रखा जाय और हवा गर्मी से बचाया जाय ऐसा करने पर मृत काया चिरकाल तक बिना विकृत हुए सुरक्षित रखी जा सकती हैं और निर्धारित विश्राम अवधि पूरी करने के उपरोक्त पुनर्जीवन के प्रयोग इस पर किये जा सकते है।
कैली फोर्नियां विश्व विद्यालय को मनोविज्ञान के प्रोफेसर डा. जेम्स वेडफोर्ड की बसीयत के अनुसार इनका शरीर इसी प्रकार सुरक्षित रखा गया। इस सुरक्षा पर होने वाले व्यय की व्यवस्था जुटाने के लिए उन्होंने वसीयत के साथ-साथ एक बड़ी धन राशि भी छोड़ी है जिससे निर्धारित कार्य बिना किसी अड़चन के पूरा होता रह सके। स्वर्गीय प्रोफेसर का विश्वास था कि विज्ञान के बढ़ते हुए चरण एक दिन मृत शरीरों में पुनर्जीवन वापिस ला सकने में भी सफल हो जाएगा। जब तक उनका शरीर भी प्रतीक्षा के लिए सुरक्षित क्यों न रखा जाए ?
जनवरी 1967 में ब्रेडफोर्ड महोदय की मृत्यु होने पर विशेषज्ञों के परामर्श के अनुसार एक दो परत वाले ताबूत में उनका शरीर बंद किया गया। देह में से ऐसे मल निकाल दिए गए जो अनावश्यक एवं विकृति उत्पन्न करने वाले थे। उसके बाद उनके ऊपर चाँदी की पतली पर्त लपेटी गई। भीतर का पर्त पूरी तरह बंद किया गया ताकि बाहरी हवा उसमें न पहुंच सके। ऊपरी परत में ऐसा नाइट्रोजन द्रव भरा गया कि उसका तापक्रम 196 सी. जितनी शीतलता बना रहे। इस द्रव की हर छः महीने के बाद अशक्त होने से पहले ही पलत दिया जाता है और शीतलता की स्थिति यथा क्रम बनाये रखी जाती है।
इसी शरीर में पुनर्जन्म लेने और मरणोत्तर जीवन का आनंद इसी काया के सहारे लेने के प्रयास अभी प्रायोगावस्था में है उनमे कब कितनी सफलता मिलेगी यह कह सकना अभी समय से पहले की बात है। पर यह तथ्य तो प्रायः मान्यता प्राप्त कर ही चुका है कि श्रम और विश्राम का संतुलन मिल कर हमें निस्संदेह दीर्घ जीवन की दिशा में आशा जनक प्रगति करा सकता है।
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