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सात लोक और सात शरीर, भूर्लोक, प्रेत लोक, अकाल मृत्यु, पितृ लोक क्या है

इस पोस्ट में सात लोक और सात शरीर, भूर्लोक, प्रेत लोक, अकाल मृत्यु, वासनात्मक मृत्यु, पितृ लोक, दूसरी मृत्यु के बारे में जानेगें। इस पोस्ट में हमलोग यह भी जानेगें कि किस तरह के व्यक्ति की पीड़ा मरने के बाद भी बनी रहती है ?





पिछले पोस्ट आत्मा के सात वाहक शरीर तथा सात भुवन के निर्माण में यह जाना था कि जिन अणु परमाणु तत्वों से भुवनों, लोक-लोकान्तरों की सृष्टि हुई है उन्हीं से उन भुवनों लोक लोकान्तरों से सबंधित शरीरों का भी निर्माण हुआ है।





भुवनों की सीमा असीम है। प्रत्येक भुवन के अपने एक विशिष्ट लोक हैं और उस लोक से सबंधित असंख्य लोकांतर हैं। प्रत्येक भुवन का अपना सूर्य है। इस प्रकार सूर्यो की भी संख्या सात है।





प्रेत लोक सात लोक सात शरीर अकाल मृत्यु पितृ लोक भूर्लोक क्या है

हमारे धार्मिक दृष्टि से उन लोकों के नाम नीचे के क्रम में इस प्रकार है :





  1. भूर्लोक
  2. भुवलोक
  3. मनःलोक
  4. स्वलोक
  5. जनलोक
  6. तपलोक
  7. सत्यलोक

इन लोकों में वही शरीर काम करता है जो उनसे सबंधित है।





भूर्लोक क्या है ?





इस लोक के अंतर्गत असंख्य लोकांतर हैं। वे सभी भौतिक अथवा अणु-परमाणु निर्मित हैं। हमारी पृथ्वी इसी लोक का एक लोकांतर हैं। पृथ्वी जैसे कितने लोकांतर हैं और कितने पर मानव जैसे प्राणियों का अस्तित्व है इसे प्रामाणिक रूप से नहीं बतलाया जा सकता है।





seven loka bhurlok pret lok pitra loka

पृथ्वी एक लोकांतर है। इस लोकांतर के दो मुख्य उपलोक हैं जिनको वासना लोक या प्रेत लोक और पितृ लोक की संज्ञा दी गई है। अणु निर्मित स्थूल शरीर भौतिक जगत में आत्मा का वाहन है और जब तक शरीर रहता है तभी तक मनुष्य का संबंध इस पार्थिव जगत से व्यक्त अथवा गोचर रूप में बना रहता है।





मनुष्य का दूसरा शरीर इस पार्थिव जगत में वासना या प्रेत शरीर हैं जो वासना के कणों से बना हुआ होता है। मगर पितृ शरीर वासना के कणों से नहीं, सूक्ष्म अणुओं से निर्मित होते हैं। एक प्रकार से यह भी वासना शरीर ही है। किन्तु इसमे भौतिक जीवन की मुख्य वासना रहती है। पितृ शरीर को प्राणमय शरीर भी कहते है।





यहां इस रहस्य को समझ लेना चाहिए कि स्थूल शरीर के साथ ये दोनों अदृश्य शरीर भी जीवन में बने रहते हैं। प्राणमय और वासनामय ये दोनों शरीर ही आकाशीय शरीर (etheric body)कहलाते हैं। जिस प्रकार पितृ लोक व प्रेत लोक में मिश्रित है। उसी प्रकार दोनों आकाशीय शरीर भी स्थूल शरीर में मिश्रित है।





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प्रेत लोक (नर्क) क्या है ?





साधारण तौर पर स्थूल शरीर से निकलकर मृत प्राणी तुरंत वासना के अनुरूप प्रेत शरीर धारण करता है। प्रेत लोक बिल्कुल अंधकारमय हैं। स्थूल लोक के साथ बिल्कुल मिला हुआ है। गहन अंधकार का वातावरण होने के कारण प्रेत लोक का दूसरा नाम ‘नर्क’ है। जहां सूर्य अथवा उसका प्रकाश नहीं है वहीं नर्क है।





प्रबल वासना और इच्छा की अपूर्णता ही नर्क का यातनामय कष्ट है। वैसे तो वासना के अनुरूप सभी प्रकार के लोगों को और सभी वर्ग के प्राणियों को कुछ समय के लिए प्रेत योनि स्वीकार कर प्रेत लोक में रहना पड़ता है। मगर उन लोगों की आयु इस शरीर और लोक में निश्चित रूप से अधिक होती हैं, जिनकी अकाल और वासनात्मक मर्त्यु हुई है।





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किस तरह के व्यक्ति की पीड़ा मरने के बाद भी बनी रहती है ?





अकाल मृत्यु क्या है ?





आयु रहते हुए किसी भयंकर रोग अथवा दुर्घटना के कारण हुई मृत्यु अकाल मृत्यु है। अकाल मृत्यु प्राप्त व्यक्ति जिस रोग अथवा दुर्घटना के कारण मरा हुआ रहता है उसकी पीड़ा और उसका कष्ट कई गुना अधिक अनुभव करता है प्रेत शरीर में। जब तक भौतिक जीवन में शेष आयु समाप्त नहीं हो जाती तब तक वह प्रेत योनि में उन कष्टों को अनुभव करता हुआ निवास करता है।





वासनात्मक मृत्यु क्या है ?





आयु रहते हुए अस्त्र-शस्त्र से, गोली लगने से, विष दिए जाने पर अथवा किसी कारणवश स्वयं विष खाकर, जल में डूबकर, स्वयं फाँसी लगाकर या अन्य किसी कारणवश हत्या या आत्महत्या से मृत व्यक्ति काफी समय तक प्रेत लोक में रहता है।





जिस कामना, वासना के फलस्वरूप उसने आत्महत्या की है उसकी अपूर्णता की मार्मिक व्यथा लेकर न जाने कब तक वासना लोक में रहता है यह बतलाया नहीं जा सकता। इसके अलावा वह एक और भयंकर कष्ट का हर समय अनुभव करता है वह है मृत्यु के समय का कष्ट।





फाँसी लगाकर, विष खाकर, आग में जलकर और पानी में डूबकर मरने वाले व्यक्ति को उस समय जो पीड़ा होती है वह मरने के बाद स्थायी बन जाती है।





पितृ लोक क्या है ?





यह प्रेत लोक से थोड़ा ऊपर है। वर्ष में केवल 15 दिन (पितृ पक्ष में) यहाँ सूर्य का धुंधला सा प्रकाश रहता है। प्रेतलोक में छोटी मोटी वासनाएं कामनाएं जब धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है तब प्राणी अपनी किसी महत्वपूर्ण संस्कार, वासना और कामना को लेकर प्राणमय शरीर यानी पितृ शरीर धारण कर पितृ लोक में प्रवेश करता है।





प्रेत लोक में घोर अशांति है मगर पितृ लोक में नहीं। इस लोक में प्राणी थोड़ी शांति और विश्राम का अनुभव करता है।





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दूसरी मृत्यु क्या है ?





एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को स्वीकार करना ही ‘मृत्यु’ है। जिस प्रकार स्थूल शरीर को छोड़कर प्राणी वासना शरीर ग्रहण करता है उसी प्रकार मरकर पितृ शरीर को स्वीकार करता है। यह उसकी दूसरी मृत्यु होती है।





मगर ध्यान रखिये जैसे स्थूल शरीर छोड़ने पर प्राणी में कोई विशेष अंतर का बोध नहीं होता वैसे ही प्रेत शरीर को छोड़कर पितृ शरीर में जाने में भी नहीं पड़ता।





स्मरण रखिये इन दोनों शरीरों में प्राणी को अपने भौतिक शरीर और अपने भौतिक जीवन की खास-खास स्मृतियाँ बराबर बनी रहती हैं। मगर एक बात अवश्य है सब कुछ सपना जैसा प्रतीत होता है उसको।





यह इस पोस्ट का पहला भाग है। दूसरा भाग स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर (astral body), इथरिक बॉडी क्या है पढ़े।





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उम्मीद करता हूँ आपको यह पोस्ट पसंद आया होगा। सात लोक और सात शरीर, भूर्लोक, प्रेत लोक, अकाल मृत्यु, वासनात्मक मृत्यु, पितृ लोक, दूसरी मृत्यु और किस तरह के व्यक्ति की पीड़ा मरने के बाद भी बनी रहती है से सबंधित कोई प्रश्न हो तो नीचे कमेंट करें।





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